Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verses 36–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
सर्वाभिवाञ्छितारम्भो न किंचिदपि वाञ्छति ।
सर्वानुमोदितानन्दो न किंचिदनुमोदते ॥ ३६ ॥
न ददाति न चादत्ते न स्तौति न च निन्दति ।
नास्तमेति न चोदेति न तुष्यति न शोचति ॥ ३७ ॥
सर्वारम्भपरित्यागी सर्वोपाधिविवर्जितः ।
सर्वाशासंपरित्यागी जीवन्मुक्त इति स्मृतः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छा करने योग्य विषयों मे अनासक्ति करने से
अन्तःकरण का जो बोधात्मक वृत्ति से स्वयं क्षय हो जाता है, वही आत्मतत्व को जाननेवाले तत्त्वज्ञो
द्वारा मोक्ष शब्द से कहा जाता है