Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
सर्वैषणाः परित्यज्य चेतसा भव मौनवान् ।
धारा निरवशेषेण यथा त्यक्त्वा पयोधरः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जब तक निर्मल आत्मा का प्रबोध उदित नहीं
हुआ है, तब तक मूर्खतायुक्त कार्पण्य से पुरुष नित्य-प्राप्त आत्मा में अप्राप्ति की कल्पना कर मोक्ष
प्राप्ति की इच्छा करता है ॥ ३ ७॥ सर्वातिशायी नित्य आत्मा के ज्ञान को प्राप्त कर जब चित्त पारमार्थिक
चिन्मात्रस्वरूप को प्राप्त हो जाता है, तब चाहे दस मोक्ष रहें, तो भी यह उनकी इच्छा नहीं करता, फिर
स्वल्प एक मोक्ष को चाहेगा ही कैसे ?॥३ ८॥ हे अभव (संसार शून्य), यह मोक्ष है और यह बन्ध है, इस
प्रकार की तुच्छ कल्पना का परित्याग कर महात्मा होकर उस मोक्ष रूप आप ही हो जाइये