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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

सर्वामरमुखो वह्नि क्रियाजालपरो ह्यपि । यज्ञलक्ष्मीश्चिरं भुंक्ते मुक्त एवेह तिष्ठति ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राण आदि वायुओं से होनेवाले चलन आदि धर्मो से युक्त देह इत्यादि से आत्मा विलक्षण है यह बतलाते हैं। वायु स्पन्दनरूप धर्म से युक्त है, अतः जब वह इस तुच्छ देह में चलता है, तब हाथ, पैर और रसनारूपी पल्‍लवों की पंक्ति चलने लगती है