Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
शुक्रोऽम्बरतलद्योती बुधः सर्वार्थपालकः ।
निर्विकारमतिः कालं नयत्यसुरदेशिकः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
शुद्ध आत्मभाव में आत्मा का संचलन नहीं होता तो भले ही न हो, पर सर्वात्मरूपता के भाव में तो
उसका वैसे संचलन हो सकता है, जैसे शाखा के संचलन से वृक्ष का संचलन होता है, इस पर कहते हैं ।
जैसे अपने प्रकाश के द्वारा दीपक घट आदि पदार्थों को प्रकाशित कर देता है, वैसे ही बोध के द्वारा
अपने स्वरूप में अवस्थित चिद्रूपी आत्मा, जिसमें समस्त अर्थ प्रतिबिम्बित हुए हैं, इन अखिल ब्रह्माण्डों
को प्रकाशित कर देता हे । निष्कर्ष यह निकला कि जैसे स्फटिक की शिला चल रहे अनेक पदार्थों के
प्रतिबिम्बं की स्वरूपता को प्राप्त होती हुई भी स्वयं अचल रहती है, वैसे ही आत्मा चल रहे पदार्थो की
स्वरूपता को प्राप्त होता हुआ भी स्वयं अचल ही रहता है