Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
जगद्भूतगणाङ्गानि चिरं संचारयन्नपि ।
सर्वदा सर्वसंचारी मुक्त एव समीरणः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मा और देह की तनिक भी
समानता नहीं है, यह जब वस्तु स्थिति है, तब दुर्बुद्धियों को "यह देह ही मैं हूँ, हाथ आदि अंग मेरे हैं
तथा स्त्री, पुत्र आदि मेरे हैं" इत्यादि अत्यन्त दुःखप्रद व्यर्थ मोह नहीं है, तो फिर है क्या ?