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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

पितामहो दिलीपस्ते सर्वारम्भपरोऽप्यलम् । वीतरागतयैवान्तर्बुभुजे मेदिनीं चिरम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे मदिरा के स्वाद से मद की महाशक्ति प्राप्त होती हे, वैसे ही अहन्ताध्यास से जीव स्थूल और सूक्ष्म शरीर के अधीन हो जाता है और उससे यह निरतिशय निबिड स्नेह से भरी अनर्थ रूपा माया यानी मिथ्याभूत माया प्राप्त हुई है, जो कि राग, लोभ, मोह आदि मद की महाशक्ति है