Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verses 42–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
असत्सदेव भातीह सदसच्चापि दृश्यते ।
आस्थानास्थे परित्यज्य तेनाशु समतां व्रज ॥ ४२ ॥
मुक्तौ राघव लोकेऽस्मिन्न प्राप्तिः संभवत्यलम् ।
अप्रवृत्तौ विवेकस्य मग्ना हि जनकोटयः ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, जिस प्रकार नैराश्य से सम
हुए अन्तःकरण से युक्त उदारमति मौनी तत्त्वज्ञ सुशोभित होता है, विकसित कुसुमों से परिपूर्ण एवं
नूतन लताओं से विराजित कुसुमाकार उस प्रकार सुशोभित नहीं होता