Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
असंसङ्गात्पदार्थानां मनःशान्तिर्विमुक्तता ।
सत्यसत्यपि देहे सा संभवत्यनघाकृते ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, 'मुझे यही
होना चाहिए ओर यह नहीं होना चाहिए" इस प्रकार की इच्छा जिसके चित्त में नहीं होती, एसे स्वाधीन
चित्तवाले या सर्वेश्वरस्वरूपवाले विद्वान् की मनुष्य किस प्रकार तुलना कर सकते हे ?