Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 83
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हिन्दी अर्थ
अतएव जब एक बार अनुभूत पदार्थ को भी अन्यथा नहीं कर सकते, तब केवल उसी एक वस्तु में
व्यसनी पुरुष के द्वारा सदा-सर्वदा अनुभूयमान पदार्थ को अन्यथा नहीं कर सकते, इसमें तो कहना ही
क्या है ? इस आशय से कहते हैं।
परपुरुष में व्यसन (आसक्ति) रखनेवाली नारी, घर के कार्य में व्यग्र रहने पर भी, उसी परपुरुष
सम्बन्धरूपी रसायन का अपने अन्दर आस्वाद लेती है