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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verses 87–89

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verses 87–89 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 87-89

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

प्रकार संकल्प कान्त से आनन्दविभोर होती है और दुःखों से पीडित नहीं होती, उसी प्रकार जिस महात्मा की अविद्या निवृत्त हो गई है, जिसकी भली प्रकारकी दृष्टि यानी तत्त्वबुद्धि है तथा जो सुन्दर आचरणों से युक्त है, ऐसा महात्मा पर्याप्तरूप से व्यवहार में निरत होने पर भी अपने अन्तरात्मा से प्रसन्नता को प्राप्त करता रहता है