Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 75, Verse 86
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 75, verse 86 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 75 · श्लोक 86
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
हे राघव, सांसारिक विभिन्न विषयानन्दरूपी
जो अनेक पुण्यरस हैं, वे सब जिसमें शहद के छन्ते की नाई एक रस हो जाते हैं, ऐसे स्वात्मानन्दचिदालोक
के निरन्तरास्वादनधारा को प्राप्त हुए ही तत्त्वज्ञ महात्मा की मति का विस्मरण कौन करा सकता है ?
इस विषय में शिवधर्मोत्तर में भी कहा गया है :
ज्ञानामृतरसो येन सकृदास्वादितो भवेत् । विहाय सर्वकार्याणि मनस्तत्रैवधावति ॥
यानी एक बार भी जिसने ज्ञानामृतरूपी रस का आस्वाद ले लिया हो, उसका मन समस्त व्यापारो
को छोडकर उसीमें अनुधावन करता है