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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 76, Verse 21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 76, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 76 · श्लोक 21

संस्कृत श्लोक

घनरसायनपूर्णसुशीतया विमलया समया सततं श्रिया । शिशिररश्मिरिवातिविराजसे विदितवेद्य सुखं रघुनन्दन ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, ध्यानरूपी सलिल से धोई गई, धीर मुक्त बुद्धि से ही भृगीश ने (शिवजी के गणविशेष ने) अपनी माता को अपने रुधिर और मांस का प्रदान किया था। (इस विषय में पुराणों मेँ उल्लेख है कि जव भृंगीश गण भगवती देवी का अनादर कर केवल शिवजी की आराधना में तत्पर हुआ, तव कुपित देवी ने माता ओर पिता के भागस्वरूप रुधिर और मांसरूप देह में से अपने मातृभाव को लौटाने की याचना की, इस याचना के अनुसार उसने शिवजी के प्रति एकनिष्ठभक्ति के प्रकाशनार्थं अनायास माता के द्वारा अपने देह में आये हुए रक्त, मांस आदि को नोचकर उनको प्रदान कर दिया)