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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथालातपरिस्पन्दादग्निचक्रं प्रदृश्यते । असदेव सदाभासं चित्तस्पन्दात्तथा जगत् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी ने कहा : हे मुनिवर, जिसने ब्रह्मतत्त्वरूप चमत्कार का अपरोक्ष साक्षात्कार कर लिया है, एसे तत्त्वज्ञ विद्वान का उदार चरित्र आप हमसे समासतः (यानी यत्र-तत्र जहाँ कक कहा गया है, उसका संग्रहकर) कहिए, क्योंकि आपके वचन में तृप्ति किसको हो सकती है ?

सर्ग सन्दर्भ

छिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त ब सतहत्तरवाँ सर्ग मन्दारमाला की नाई विद्वानों को मस्तक और गले में धारण करने योग्य माला का जीवन्मुक्तों के गुणों से वसिष्ठजी द्वारा गुम्फन ।