Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
द्वादशाङ्गुलपर्यन्ते नासाग्रे विमलाम्बरे ।
संविद्दृशि प्रशाम्यन्त्यां प्राणस्पन्दो निरुद्ध्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञ ऊपर-ऊपर से समस्त अर्थो को करता है, पर भीतर किसी प्रकार की इच्छा
न रहने के कारण बाह्य अर्थो में सत्यता-बुद्धि से किसी तरह की आस्था नहीं करता ओर न उससे
जनित फलों की चाहना ही करता है