Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
एभिः क्रमैस्तथान्यैश्च नानासंकल्पकल्पितैः ।
नानादेशिकवक्रस्थैः प्राणस्पन्दो निरुध्यते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि प्रसिद्ध शुभ कर्मो के फलों के विद्यमान रहते उनके विरोधी पुत्र-वियोगजनित
दुःख आदि भी अपना अस्तित्व रख सकेंगे, तो वह युक्त नहीं है, क्योकि जीवन्मुक्तपुरुषो को शुभ
कर्मो का अभाव होने से उन दोनों की प्रसक्ति ही नहीं है, ऐसा कहते है।
शुभ कर्मो का अभाव होने से सुखाभाव में स्थिति को प्राप्त होने पर शुभ फलों से विलक्षण दुःखसंविद्
केसी, किस प्रकार की ओर कहाँ प्राप्त हो सकती है ?