Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
अभ्यासेन निराबाधमेतास्ता योगयुक्तयः ।
उपायतामुपायान्ति भव्यस्य भवभेदने ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
जो दुःखदशा सुखानुभव के बाद अपना
अस्तित्व प्राप्तकर अपने कार्य शोक, मोह आदि कर्मो का विस्तार करती हे, वह दुःखदशा शुभ कर्मो का
अभाव होने से सुख के शान्त हो जाने पर खुद भी शान्त ही हो जाती है, इसलिए बिना कारण के
अस्तित्व से वह कैसे हो सकती है, यों पूर्वोक्त अर्थ का ही स्पष्टीकरण किया गया हे