Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
भूयोभूयश्चिराभ्यासाज्जिह्वाप्रान्तेन तालुनि ।
घण्टिका स्पृश्यते प्राणो येनोच्चैर्निवहत्यलम् ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
मन का भले ही विनाश हो जाय, इससे भी क्या हुआ ? इस पर कहते हैं।
हे श्रीरामजी, तिलो के अत्यन्त दग्घ हो जाने पर तेल की कल्पना ही कैसे हो सकती है ? इसी
प्रकार मूल पर्यन्त मन के क्षीण हो जाने पर संकल्प की कथा ही कैसे हो सकती हे ?