Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 78, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 78, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 78 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
भ्रूनासातालुसंस्थासु द्वादशाङ्गुलिकोटिषु ।
अभ्यासाच्छाम्यति प्राणो दूरे गिरिनदी यथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उससे क्या हुआ ? इस पर कहते हैं।
रम्य ओर अरम्य दृष्टि के निरास से भोग अभिलाषा के निवृत्त हो जाने तथा नैराश्य के निरन्तर
प्रोढ हो जाने पर अन्तःकरण हिम की नाई गल जाता हे