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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । योगयुक्तस्य चित्तस्य शम एव निरूपितः । सम्यग्ज्ञानमिदानीं मे कथयानुग्रहात्प्रभो ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे रात्रि में जलती हुई लकड़ी को गोल घुमाने से असत्‌ ही अग्निमयचक्र सत्‌-सा दिखाई पडता हे, वैसे ही चित्त के प्रस्पन्दन से असत्‌ जगत्‌ सत्‌-सा दिखाई पडता है

सर्ग सन्दर्भ

सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त अठहत्तरवाों सर्गं चित्त के स्पन्दन से होनेवाली जगत्‌ की भ्रान्ति, चित्तस्पन्दन के स्वरूप और उसके निरोध में हेतुभूत योग का भली प्रकार वर्णन ।