Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
कृतस्फारविचारस्य मनोभोगादयोऽरयः ।
मनागपि न भिन्दन्ति शैलं मन्दानिला इव ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने
कहा: महाराज, देहरूपी अपने घर में स्थित हृदयादि स्थानों मे विद्यमान बहत्तर हजार नाडीरूपी छिद्रों
में निरन्तर संचरण कर रहे तथा मुख, नासिका आदि छिद्रोंरूपी बाह्य आकाशो में निरन्तर गमनशील
प्राण आदि वायुओं का परिस्पन्दन कैसे रोका जा सकता है ?