Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
नानात्वमस्ति कलनासु न वस्तुतोऽन्तर्नानाविधासु सरसीषु जलादि नान्यत् ।
इत्येकनिश्चयमयः पुरुषो विमुक्त इत्युच्यते समवलोकितसम्यगर्थः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा पूरक, कुम्भक और रेचक के क्रम से प्राणवायु का निरोध करके दुदान्ति मन का निरोध
करना चाहिए, ऐसा कहते हैं।
दृढ़तापूर्वक पुन:-पुन: परिशीलनरूप अभ्यास लक्षण हेतु से प्रयास के बिना अनायास उत्पन्न हुए
कुम्भक की सिद्धिपर्यन्त पूरक आदि के द्वारा किये गये अपने प्राण के नियमन से होनेवाले एकान्त
ध्यानयोग से (नित्यानित्य वस्तु का यथार्थ रूप से विवेक कर नित्य अद्वितीय वस्तु में प्रवर्तित ध्यानयोग
से) प्राणवायु की समग्र चंचलता निरुद्ध हो जाती है