Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 31
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हिन्दी अर्थ
(“अथ यदिदमस्मिन्त्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः“) (उत्तम, मध्यम
अधिकारी के प्रति ब्रह्मज्ञान हेतुभूत शरीर में यह प्रसिद्ध छोटा कमलसदश हृदयरूपी घर है, इसके
अन्दर सूक्ष्म आकाश है) इत्यादि श्रुति से प्रसिद्ध दहराकाश में चिरकाल तक चित्त को लगाने से
ब्रह्मसाक्षात्कार के होने पर भी प्राणस्यन्दन रुक जाता है, ऐसा कहते है ।
हे मननशील रामजी, हृदय में चिरकालपर्यन्त श्रुति प्रतिपादित दहराकाश की नियत भावना से
जनित विषयवासना वर्जित चित्त से होनेवाले ध्यान से प्राण का स्पन्दन निरुद्ध हो जाता हे । पांतजलयोग
सूत्र में भी कहा है : "हदये चित्तसंवित्", '...स्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम्” (दहराकाश में संयम से सवासन
चित्तसाक्षात्कार होता है, चित्स्वभाव में संयम करने से पुरुष का साक्षात्कार होता है ।)