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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 36

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

संवित्‌-मात्रस्वरूप से स्थित हृदय तो उपादेय कहा गया है। (यदि शंका हो कि आत्मा के लिए जो हृदय शब्द का प्रयोग होता है वह गौण है, क्योकि हृदय में स्थिति करने के कारण ही तो आत्मा हृदय कहा जाता है, इस पर कहते हैं। ) यह आत्मा सबके भीतर और बाह्य है और भीतर एवं बाह्य नहीं भी है ॥ ३ ५॥ वह उपादेय हृदय प्रधान हृदय है, उसीमें यह समस्त जगत्‌ विद्यमान है, वही समस्त पदार्थों का आदर्श है और वही सम्पूर्ण संपत्तियों का कोष है, क्योकि "अस्मिन्‌ द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते" (इसमें भीतर आकाश और पृथ्वी से उपलक्षित समस्त वस्तुजात विद्यमान हैं) यह श्रुति हे