Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verses 5–6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verses 5–6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

संकल्पांशविनिर्मुक्ता संवित्संवेद्यवर्जिता । संवित्त्याभिसमाख्याता मुक्तावस्तीह नेतरत् ॥ ५ ॥ सा शुद्धरूपा विज्ञाता परमात्मेति कथ्यते । शुद्धा त्वशुद्धरूपान्तरविद्येत्युच्यते बुधैः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त के स्यन्दनस्वभाव को चित्त से अलग नहीं कर सकते, इसलिए दृष्टान्तो के ही द्वारा उसका दिग्दर्शन कराते हैं। वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जैसे शुक्लत्व ओर हिम, जैसे तिल और तेल का अंश, जैसे कुसुम और सुगंध तथा जैसे अग्नि और उष्णत्व परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध और अभिन्‍नरूप हैं, वैसे ही हे राघव, चित्त और स्पन्दन परस्पर एक दूसरे से सम्बद्ध और अभिन्नरूप हैं, उनके भेद की केवल मिथ्या कल्पना की गई हे । सर्वत्र गुण-गुणी आदि स्थलों मेँ अविचार से भेद सहिष्णु अभेद ही संश्लेष (सम्बन्ध) है, विचार करने से वहाँ पर भेदांश मिथ्या और अभेदांश वास्तव है, यह "अभिन्नौ" इससे बतलाया