Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
असम्यग्वेदनाज्जन्म मोक्षः सम्यगवेक्षणात् ।
असम्यग्वेदनाद्रज्जुः सर्पो नो सम्यगीक्षणात् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी ने कहा : हे ब्रह्मन्,
जिस स्वभाव विशेष से चित्तप्रस्पन्दित होता है और जिस उपाय विशेष से वह वैसा प्रस्पन्दित नहीं
होता है, उसे मुझसे कहिए, जिससे कि आपके दर्शित मार्ग से मैं उस चित्त को स्पन्दरहित बनाऊँ