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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 8, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 8, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 8 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अन्ये ऊचुः । उत्थितानुत्थितानेतानिन्द्रियाहीन्पुनः पुनः । हन्याद्विवेकदण्डेन वज्रेणेव हरिर्गिरीन् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

औरों ने कहा : जैसे इन्द्र वज से पर्वतां के ऊपर प्रहार करते हैं वैसे ही पुनः पुनः उठे हुए इन इन्द्रियरूपी संगों पर विवेकरूपी दृष्टि से प्रहार करना चाहिये