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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 80, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

चक्षुरालोकनायैव जीवस्तु सुखदुःखयोः । भारायैव बलीवर्दो भोक्ता द्रव्यस्य नायकः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

लक्षण, स्वरूप एवं साधन आदि से सम्यक्‌ ज्ञान का निरूपण करनेवाले महाराज श्रीवसिष्ठजी पहले आत्मा के परिचय से किया गया जगत्‌ का बाध ही सम्यक्‌ ज्ञान है, यो उसका (सम्यक्‌ ज्ञान का) लक्षण करते हैं। वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, इस जगत्‌ में आदि और अन्त से रहित अवभास स्वरूप परमात्मा का ही केवल अस्तित्व है, इस प्रकार का असाधारण एवं अपरिच्छिन्न आकारवाला जो निश्चय है, विद्वान्‌ लोग उसी निश्चय को सम्यक्‌ ज्ञान कहते हैं