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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 80, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इदमन्तः कलयतो भोगान्प्रति विवेकिनः । पुरःस्थितानपि सदा स्पृहैवाङ्ग न जायते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामजी ने कहा : हे भगवान्‌, पूर्व सर्ग “दरौ क्रमौ चित्तनाशस्य“ इत्यादि से उपक्रान्त दो उपायों में से आपने योगयुक्त पुरुष के चित्त का विनाश-प्रकार ही निरूपित किया है। अब आप अनुग्रह कर मुझसे सम्यक्‌ ज्ञान कहिये यानी सम्यक्‌ ज्ञान निरूपण कीजिए

सर्ग सन्दर्भ

अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त उन्‍नासीवाँ सर्ग चित्त के विनाश के लिए जिन योग और ज्ञानरूपी दो उपायों का उपक्रम किया था, उनमें से पहले का पूर्व सर्ग में परिज्ञान हो जाने से द्वितीय का वर्णन ।