Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 79, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 79, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 79 · श्लोक 55
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हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, जिस महात्मा की समस्त कामोपभोग की इच्छाएँ निवृत्त हो गई हैं, जिसकी कामोपभोग
की उत्कण्ठाओं के अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थों में हित अहित वासनाएँ निवृत्त हो गई है तथा जिसका
अन्तःकरण समस्त हितअहित व्यवहारों के होने पर भी हर्ष ओर विषाद से वर्जित हो गया है, वह मुक्त
अन्तःकरण महात्मा सब पुरुषों मे श्रेष्ठ और साक्षात् नारायण हो जाता है