Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 80, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
साक्षिवत्त्वं स्थितं नेत्र रूपमात्मनि तिष्ठति ।
आलोकं कालवशतस्त्वमेकं किं प्रतप्यसे ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में ज्ञान और विषय में अविज्ञानजनित ही भेद है, ऐसा कहते है ।
हे श्रीरामजी, संवित्ति (ज्ञान) ही संवेद्य (विषय) है, वास्तव में इन दोनों की तनिक भी भेद-
कल्पना नहीं है, आत्मा ही आत्मा का चयन करता हे यानी आत्मा ही अज्ञान से आत्मा को नानारूप बना
देता है ओर ज्ञान से आत्मा की एकरूपता का परिचय कर लेता है, आत्मा से पृथक् कुछ भी नहीं है