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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 80, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 80, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 80 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

उत्पन्नध्वंसि चापातमात्रहृद्यमसन्मयम् । रूपमाश्रय मा नेत्र विनाशायाविनाशिने ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, विद्वानों के द्वारा समस्त मलों से विनिर्मुक्त वह संवित्‌ जब विज्ञात हो जाती है, तब परमात्मा कही जाती है ओर स्वतः निखिल मलों से वर्जित होने पर भी जब अध्यासवश भीतर से अशुद्धरूप होती है, तब अविद्या कही जाती हे