Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 43
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
न मुझे इच्छा है, न मेरे कर्म हैं, न मेरा संसार है, न मुझमें कर्तृत्व हैं, न मुझमें भोक्तृत्व
है और न मेरी देह है। मद्रूप ही आत्मा को नमस्कार हैं ॥४ २॥ मैं आत्मा यानी आत्मशब्दजन्य प्रतीति का
विषय नहीं हूँ, मे अनात्मा भी नहीं हूँ, तत्त्वदष्टि से अतिरिक्त ऐसे किस पदार्थ की संभावना की जा
सकती है, जो मेरे स्वरूप हो सके, इसी प्रकार अहंशब्दजन्य प्रतीति का विषय और उससे भिन्न मै नहीं
हूँ, ऐसी स्थिति में मुझसे अन्य की अप्रसिद्धि होने से स्वयं ही मैं सर्वस्वरूप और सर्वात्मिक ही हूँ, यह
अर्थ है; ऐसे मद्रूप ही आत्मा को नमस्कार है