Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
मृतं चित्तं गता तृष्णा प्रक्षीणो मोहपञ्जरः ।
निरहंकारता जाता जाग्रत्यस्मिन्प्रबुद्धवान् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
चक्षु के द्वारा दृष्ट पदार्थाकार वृत्ति चित्त में भले ही हो, तथापि उसमें अभिनिवेश के हेतु अहंकार
के होने में कोई हेतु नहीं है, ऐसा कहते है ।
हे चित्त, प्रलयकालीन जल में मछली की नाई स्फुरण धर्मवाले चित्त में स्वयं रूप आदि विषयाकार
का यदि स्फुरण होता है, तो वह भले ही हो,परन्तु अहंकाररूप से तुम किस निमित्त को लेकर
उत्थित हुए हो ?