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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 81, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 81, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 81 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

चित्ताभावे परिक्षीणा बाल्यतृष्णादयो गुणाः । आलोकोपरमे चित्रा वर्णाख्या इव संविदः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए तुम भी साक्षी की तरह स्थित सद्रूप को देखो, यह भाव है । सम्प्रति चक्षु के द्वारा भान्ति से रूप के देखे जाने पर भी चित्त को उसमें अभिनिवेश करने में कड हेतु नहीं है, यह कहते है। हे चित्त, नदी आदि के जल में दृश्यमान नाना प्रकार के विचित्र अनियत तरगों की नाई अनियत, आकाश में सूर्य के संमुख अश्रुसहित नेत्रवाले पुरुष को दिखाई पडनेवाली मयूर पिच्छिका की (मोर के पंख की) नाईमिथ्याभूत एवं "यह घोडा हे", “यह गाय हे", “यह स्त्री है" इस तरह की अनेक अच्छी -बुरी जातियों के विकल्पों से जनित यह नाना प्रकार की रूपदृष्टि (सौन्दयनुभूति) चक्षु को स्फुरित होती है, ऐसी परिस्थिति में तुम्हें क्या मिला, जिससे कि तुम उसमें अनुरक्त होते हो ओर वृथा सन्तप्त होते हो ?