Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अहो नु चञ्चलमिदं प्रत्याहृतमपि क्षणात् ।
न मनः स्थैर्यमायाति तरङ्गप्रौढपर्णवत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
इस लोक में व्यवहार दृष्टि से ओर
श्रुतिदृष्टि से क्रमश: चित्त आदि एवं आत्मा आदि जो अस्तित्वरूप से प्रसिद्ध वस्तुरूप पदार्थ हैं तथा
रज्जु-सर्प आदि एवं वन्ध्या पुत्र आदि जो नास्तित्वरूप से प्रसिद्ध अवस्तुरूप पदार्थ हैं, वह सब आकाश
से भी अत्यन्त निर्मल, स्वप्रकाश, शान्त, असीम, व्यापकस्वरूप ब्रह्यात्मक ही है, क्योकि उसी में सत्
असत्रूप विकल्पों का आरोप होता ह