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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अथेमामपरां राम शृणु दृष्टिं पदप्रदाम् । मुनिना वीतहव्येन ययाऽऽस्थितमशङ्कितम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्त अवस्तुरूप ही है, इसका साधन कहते है। जैसे आकाशवृक्ष भ्रमवश अन्यरूप से प्रतीत होता है, वास्तव में वह विशुद्ध आकाशस्वरूप ही है, उससे पृथक्‌ आकाशवृक्ष नहीं है यानी असत्‌ ही है, वैसे ही चित्त जड़, चित्त अन्तर से शून्य ओर माया का कार्य होने से निश्चयरूप से असत्‌ ही है, वह केवल विशुद्ध आत्मस्वरूप ही है