Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
वीतहव्यो महातेजा विबभ्राम वने पुरा ।
विन्ध्यशैलदरीर्दीर्घा रविर्मेरुदरीरिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे नौका में
अवस्थित अज्ञानी बालक को तटवर्ती स्थाणु मे प्रतीत होनेवाला गति आदि परिस्पन्द केवल भ्रान्ति से
ही दिखाई पड़ता है, वैसे ही यद्यपि अज्ञानी को चित्त दीखाई पडता है तो भी आत्मज्ञानी तत्त्वज्ञ की
दृष्टि में वह है ही नहीं, किन्तु असन्मय ही है