Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 82, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 82, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 82 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
निर्विकल्पसमाध्यंशलभ्योदारपरेच्छया ।
स जहार जगज्जीर्णां स्वव्यापारपरम्पराम् ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त युक्तयो
से चित्त का अस्तित्व है ही नहीं, चित्तात्मक केवल ब्रह्म का ही अस्तित्व है, चूँकि बाह्य और आभ्यन्तर
पदार्थो की भावनाएँ असदात्मक चित्त से ही विस्तार को प्राप्त होती हे, इसलिए असत्स्वरूप उनका मैंने
परित्याग कर दिया