Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अशङ्कितनभःकोशपतिताकुलपूरवत् ।
नापतन्ति विकल्पौघाश्चिरं वैकल्यकारिणः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अब इन्द्रियो को ही भत्सनापूर्वक बोधन करते हैं।
सागर के तरंगों की नाई अतिचंचल हे हतभाग्य इन्द्रियगण, इस जन्म में समाधि के द्वारा आत्मदर्शन
के लिए अभी तक तुम्हें अवसर प्राप्त नहीं हुआ क्या ?