Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
सर्वस्याह्लादनी शान्ता मैत्री परमपावनी ।
अभ्युदेति हृदो हृद्या सुतरोरिव मञ्जरी ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चंचल स्वभाववाले इन्द्रियगण, अब
तुम लोग अनर्थ के लिए चंचलता मत करो, अपने दुःखदायक भूतकालीन कर्मो का तुम बार-बार खूब
स्मरण कर लो