Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
अन्तश्छिद्रवती जाड्ययुक्तायुक्तगुणा स्वयम् ।
चिन्ता शोषमुपायाति हिमदग्धेव पद्मिनी ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
हे इन्द्रियगण, तुम लोग मन ही के अलग-अलग द्वार के रूपों मेँ कल्पित हो, अतएव निश्चित
अधम ओर जड ही हो, हम जानते हैं कि जड में प्रवृत्ति ओर जल में तरंगरूपी प्रवृत्ति का आश्रयत्व
मृगतृष्णा की नाई मिथ्या हे