Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
अमृतापूरपूर्णेन नित्यानन्दमयेन च ।
स्थीयते पुरुषेणान्तः शीतेन शशिना यथा ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चक्षुआदि इन्द्रियगण, सत्य स्वरूप से विरहित तुम लोग मेरे प्रति मिथ्या ही
गरज रहे हो, तुम लोग अलातचक्र के सदुश ओर रज्जु में सर्प-भ्रम के सदुश मिथ्यारूप ही हो