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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

दग्धानामिव पर्णानां रसानां पुनरागतिः । पुंसां क्षपितसंसारजराजन्ममहाध्वनाम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

तब क्यो इन्द्रियो के व्यापारो मे आत्मा की कारणता प्रसिद्ध है, इस पर कहते है । हे इन्द्रियगण, केवल चैतन्यसत्ता की सन्निधि से ही तुम लोगों की परस्पर चेष्टा उस प्रकार पूर्णरूप से रहती है, जिस प्रकार आदित्य के रहने पर श्राद्ध और कृषि आदि कर्म करनेवाले पुरुषों के उनके इच्छानुसार तत्‌-तत्‌ कर्म रहते हैं