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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

अपुनर्भ्रमणायात्मद्रुमे विश्रम्यते चिरम् । एवंप्रायास्तथान्याश्च भवन्ति गुणसंपदः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

अव ललकार कर चित्त को प्रबुद्ध करते है । हे चित्तरूपी चारण (इन्द्रियों की बहिर्मुखता के प्रचार मे हेतुभूतः), हे चार्वाक (देह मेँ आत्माभिमान करनेवाले), हे चारों दिशाओं में उदर भरण के लिए भिक्षा माँगनेवाले, तुम इस जगत्‌ में कुत्ते की नाई निरर्थक अनर्थ के लिए इस प्रकार विचरण मत करो