Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
चित्ततायां प्रनष्टायां स्थितस्त्वं परमेश्वरः ।
प्राक्स्वरूपविलासस्ते श्रेयसे स्थितिमागतः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
हे चित्त, यदि तुम यह
कहो कि पत्थर की प्रतिमा किसी अन्य चेतन के व्यापार से नाच करती हुई देखी जाती है, तो इस पर मैं
तुम्हें यह सदुपदेश देता हूँ कि तुम भी उस ईश्वर के चिदाभासरूपी अंश से दीर्घकाल तक अपना
जीवन-निर्वाहि करो, स्वतः तुम अपना जीवन निभा नहीं सकते । ऐसी स्थिति में प्रतिमा के नर्तनरूपी
फल का उपभोक्ता जैसे चेतन ही हे, प्रतिमा नहीं है, वैसे ही तुम्हारे द्वारा किये गये जीवन आदि फलों
का उपभोक्ता चिदात्मा ही है अतः तुम जीवन, अभिलाषा, हनन, गमन ओर गर्जन के लिए वृथा ही
दौड़-धूप करते हो