Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
स्वसत्ता स्फुटतां याति दुःखाय तव चित्तक ।
तप्तकाञ्चनरुल्लासो दाहायैव स्वपार्श्वयोः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
वीतहव्य को समाधि की इच्छा कैसे हुई इसे कहते है।
किसी समय की बात हे कि संसाररूपी भ्रम को देनेवाले तथा घोर आधि और व्याधिमय आकारवाले
इस सांसारिक क्रियाकलापों से महामुनि वीतहव्य उद्विग्न हो उठे