Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 58
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि मैं आत्मस्वरूप ही हूँ, तो (मनसैवानुद्रष्टव्यम्“ (मन से ही आत्मा का साक्षात्कार करना
चाहिए), मनसैवेदमाप्तव्यम्” (मन से ही इसको प्राप्त करना चाहिए) इत्यादि श्रुतियों में मुझको आत्म-
प्राप्त का उपकरण क्यो बतलाया गया है ? तो इस पर कहते हैं।
अज्ञान दशा में ही आत्मशारत्र ओर आचार्य के द्वारा किये गये उपदेशों के प्रयोजन की सिद्धि के
लिए कारणरूप से कल्पित तुम्हारे द्वारा आत्मा शुद्धस्वरूप अपने तत्त्व को अन्तिम साक्षात्कार का
विषय करता है, यह उक्त श्रुति द्वारा कहा जाता है । जैसे अपने मुख के स्वरूप को देखने की इच्छा
करनेवाला पुरुष दर्पणरूप उपाधि के ऊपर अधिरूढ अपने मुखरूप ही करण से मुख को देखता हे,
वैसे ही प्रकृत में समझना चाहिए