Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 65
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 65
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हिन्दी अर्थ
अतः परिशेष से इश्वर के लिए ही तुम्हे प्रवृत्ति कहनी चाहिए, पर उसका तो उत्तर कहा ही गया है,
ऐसा कहते हैं।
हे चित्त, यदि तुम्हारा यह अभिप्राय है कि भोग के स्वामी कर्ता परमात्मा के लिए मेरी तथोक्त
प्रकार की अर्थो में प्रवृत्ति है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि भोग के स्वामी परमात्मा की कुछ भी इच्छा
नहीं है, कारण कि वह सदा ही तृप्त है