Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 66
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verse 66 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 66
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हिन्दी अर्थ
परमात्मा परिपूर्ण और अद्वितीय है, अतः उसको इच्छा नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं।
स्वभावतः प्रकाशस्वभाव, सर्वत्र व्यापक, अद्वितीय चैतन्यात्मा ने ही इस समस्त ब्रह्माण्ड को व्याप्त
कर रक्खा है, इसलिए दूसरी कोई कल्पना ही नहीं है