Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verses 79–80
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 83, verses 79–80 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 79,80
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हिन्दी अर्थ
जैसे समुद्र मे तप्त अंगार नहीं रह
सकता, वैसे ही आत्मा में दूसरी कोई कल्पना ही नहीं रह सकती, इस प्रकार जब आत्मदेव में कल्पना
का अभाव है तथा मन एवं देह जड हैं, तब विवेक दृष्टि से यह अन्य हे, यह अन्य नहीं है, यह शुभ है, यह
अशुभ हे "इत्यादि असत् कल्पनाएँ कल्पक के भाव से ही नहीं रह सकती । ऐसी स्थिति में हे सुन्दर
चित्त, संवेद्य से निर्मुक्त संवित् ही सारभूत वस्तु है, दूसरी नहीं